जिसे शब्दों की तलाश है

There’re 11 unpublished posts in my drafts and umpteen in my head.
And I don’t know where to start or what to say except some words stolen from here.

भटक भी जाऊं मैं कभी, तो रहती सुबह की आस है,
जीवन है एक अधूरी कविता, जिसे शब्दों की तलाश है,
आप ही धुन में है शायद, या करता कोई इंतज़ार है,
आप में ही है द्वन्द सारा, और आप से ही प्यार है,
आप से ही हार है शायद, आप में ही जीत है,
जीवन है बस खुद की तलाश, यही जग की रीत है,
आप में ही मोक्ष है सबका, आप में भगवान् है,
आप में सीमा है सबकी, और आप में ही उड़ान है,
आप में है विनाश, और आप में ही परवान है,
आप में है दरिद्रता सारी, और आप में ही सम्मान है,
मिलता हूँ नित नयी सरिता में, फिर भी बाकी प्यास है,
जीवन है एक अधूरी कविता, जिसे शब्दों की तलाश है|

आप में है प्रतिबिम्ब सारा, आप में ही अक्स है,
जो बनने का प्रयास है निरंतर, आप में ही वो शख्स है,
आप में है लड़ाई सारी, आप में ही तो युद्ध है,
आप ही हौसला है अपना, और आप ही विरुद्ध है,
आप में बंधन है सारे, आप में स्वतंत्रता,
आप में बिखरते हैं सब, और आप में ही अखंडता,
आप में है राह जैसे, आप में हर संकट है,
आप में है परिवर्तन सारा, क्यूंकि आप में ही हर कंटक है,
मुस्कान अविरल रहे मुख पर, पर फिर भी क्यूँ मनं उदास है,
जीवन है एक अधूरी कविता, जिसे शब्दों की तलाश है|

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